India elects itself as the largest opposition in the world

After watching PM Modi’s biopic the biggest learning it gave was the strength of dissent to build a strong nation. As BJP led NDA once again finds weaker opposition in the parliament, can we citizens take this opportunity as an honour to build a strong nation? 

Voting in a democracy is definitely your moral responsibility (not constitutional) as much as your legal right (under the representation of the people Act, 1950, section 62(1)). But our responsibility does not end here by electing our MP (yes we vote for our MP not the PM), rather than our responsibility begins here. And looking at the enthusiasm amongst voters in this electoral process, we can say we all abide to one single goal of building a strong nation.

Strong nation needs to eradicate all the weakness or blockades. And to achieve this we first need to recognise the shortcomings. If there is a garbage nearby my house and the local municipality is not helping to clean it up it is my duty to raise this question as it can lead to serious illness amongst the people. With social media platforms like Twitter and Facebook you can just click a picture and tag your MLA and MP to register your complaint. This would make you a responsible citizen and lead towards a better society, a better country. We need to do away with the hesitation from inside that why should I take the initiative. Instead, you should be eager to take such steps because you have voted to get that shit done.

No one in a democracy should even be given extreme powers that is the central essence of our Constitution. PM Modi himself embraces the debate of Constructive Criticism on his radio show ‘Mann ki Baat’ from May, 2017. By saying that government must be accountable in democracy, “I thank those people who provided critical and important feedback. The mistakes and the shortcomings once highlighted can be rectified.”

The opposition Indian National Congress (INC) has secured only 52 seats and fails to secure a Leader of Opposition post once again (party needs to secure at least 10% seats to get a LOP). So the onus lies on the 1 billion citizens of this country to help building a constructive criticism by recognising the issues and eradicate all the blockades. Also, if you do not receive any positive response then try to pressurise your MP with the help of your friends and family and everyone on your social media. Be prepared for a healthy revolt always. Remember always it starts from you.  

Redefining opposition

In October 1937, Jawaharlal Nehru was about to get elected as the President of his party for the third time. Around that time a Kolkata based publication, “The Modern Review” wrote a stinging article attacking Nehru. The article was penned by Chanakya and heading was “Rashtrapati Jawaharlal Nehru”. The article said Nehru’s popularity was widening amongst the masses. He presents himself as a Democratic and Socialist leader but his language seems he is a fascist. In fact he has all the elements to be an Aristocrat. The Chankya was none other than Jawaharlal Nehru himself. In those days he understood the necessity of a strong dissent which was not present. He had seen how the power was misused by Hitler and Stalin. And so he wrote about why he should not be elected as President of the party. No political leader in the present time might endorse this ideology. 

At present, India seems progressing but we need to eliminate all the complications parallel to focussing on our strong points.

इम्मिग्रेशन के मामले में हमारा दोगलापन!

इम्मिग्रेशन (आप्रवासन) मतलब जब कोई अपना देश या मूल निवास स्थान छोड़कर कहीं और जाके स्थायी रूप से बसे। अब इसे समझने वाले दो तरह के लोग होते हैं। एक होते हैं जो अपने देश या अपने राज्य को सिर्फ़ अपना मानते है और एक होते हैं जो पूरी दुनिया को एक मानते हैं। 

लेकिन कोई भला क्यूँ अपना देश या अपनी जन्मभूमि छोड़कर किसी और प्रदेश में जाके बसना चाहेगा? इसका एक ही सरल जवाब हैं “बेहतर अवसर के लिए/ बेहतर भविष्य के लिए”। चाहे यह अमरीका के इमिग्रंट्स से पूछो या गुजरात में आने वाले किसी उत्तर प्रदेश के व्यक्ति से सबका जवाब इसी बात के आसपास मिलेगा। 

कई बरसो पहले लोगों के जीवन में पैसों से व्यापार कम और वस्तुओं की अदल बदल से ज़्यादा रहता था। लेकिन धीरे धीरे एक राज्य से दूसरे राज्य के व्यापार होने लगे और देखते ही देखते यह व्यापार देश विदेश के बीच एक बेहद आवश्यक प्रकरण बन गया। अब जिसके पास कृषि उत्पाद कम था वह पैसे देकर अपने राज्य की माँग पूरी करने लगे। और आज यह व्यापार हम अपनी रोज़मरा की ज़िंदगी में करते हैं। और व्यापार के लिए पैसे आवश्यक हो गए।

लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ युवा वर्ग के लिए पैसे कमाने के अवसर कम हैं। अब वह अवसर की खोज में अच्छे राज्य या देश की ओर जाते हैं और बस जाते हैं। वह जिस राज्य या देश में जाके बसते हैं वहाँ के लोग उन्हें अस्वीकार करते हैं और तभी समस्या खड़ी होती हैं।

अब यह मुद्दा राष्ट्रवाद बनाम अंतर्राष्ट्रीयवाद हैं। अगर आप इन लोगों का विरोध करे तो आपको राष्ट्रवादी या स्वार्थी कहा जाएगा और अगर आप उन्हें दोनो हाथ फेलाकर स्वीकार करे तो ग्लोबलिस्ट कहे जाएँगे। नैतिक रूप से शायद आप यह कहेंगे की हमें हर इंसान को अपना समझकर स्वीकार करना चाहिए लेकिन जब तक उनकी ख़ुदके लाभ के बीच ना आए तब तक ही यह बात अच्छी लगेगी। लेकिन कोई अपना हक़ का बँटवारा शायद ही करना चाहेगा। 

इन लोगों को कई नेता अपनी राजनीति के लिए आतंकवादी या फिर जंग छेड़ने वाले लोगों की शक्ल में पेश करते हैं। अब यह कितना सच और कितना जुठ है यह आप लोग ही तय करे। आप नेशनलिस्ट हैं या ग्लोबलिस्ट यह ज़रा सोचे और बताए। सच बोलिएगा लिबरल विचारों का सम्मान करता हूँ लेकिन सचाई को नमन करता हूँ। क्यूँकि में ख़ुद भी बेहतर अवसर के लिए अपने राज्य से बाहर निकला था और तभी आज कुछ बन सका हूँ। लेकिन में शायद ही किसी और को अपनी जगह देना चाहूँगा। लेकिन क्या यह विचार मुझे सनातन धर्म के मूल संस्कार ‘वसुधेव क़ुतुम्बकम’ के विरुद्ध नहीं ले जाते?

इसका निष्पक्ष उत्तर शायद यहीं हो सकता हैं की अगर हम हमारे आसपास जितने अवसर मोजुद हैं उनसे ही संतुष्ट रहे और पैसों से व्यापार कम कर दे। शायद यह असंभव सुनाई पड़ता हैं ना? तो आप ही बताइए कोई उपाए…

या फिर कहिए आप भी इस मामले में हैं दोगले।

इंटरनेट कैसे इस्तेमाल करे?

देश के किसी भी सामान्य नागरिक तक कोई भी गलत या अधूरी जानकारी पहुंचना बेहद घातक हैं. खास करके अगर वह जानकारी देश की राजनीती से जुडी हुई हो तब.

कुछ दो साल पहले भारत में एक अभूतपूर्व प्रसंग आया जब जियो सिम द्वारा सामान्य से सामान्य व्यक्ति के पास इंटरनेट सुविधा उपलब्ध हो गई. इससे भारत देश में एक क्रांति फेल गई. हर कोई मानो जैसे बरसो से इंटरनेट इस्तेमाल करने का आदि था कुछ वैसी स्थिति थी यह. (भारत में इंटरनेट १९९३ में ही आ गया था जो श्रीनिवासन वेंकटकृष्णन ने लाया था.)

भारत देश टेक्नोलॉजी में दूसरे देशो से थोड़ा पीछे रहा हैं और यहीं प्रमुख कारण भी कहा जा सकता हैं की अंग्रेज़ो ने हम पर इतने साल हुकूमत की. सोचो अगर भारत की संस्कृति और टेक्नोलॉजी एक समक्ष विक्सित होती तोह बेशक आज हमारी गिनती महासत्ता वाले देशो में होती. शायद भारतीय, टेक्नोलॉजी से ज़्यादा अपनी मेहनत पर विश्वास करते थे इसलिए उन्होंने अपने काम को सरल बनाने के तरीको पर कभी ध्यान ही नहीं दिया. 

मुद्दे पर आते हुए अब हमारे पास इंटरनेट तोह आ गया है लेकिन क्या हमे इसे इस्तेमाल करना आता हैं यह सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रश्न हैं. 

हम लोग इंटरनेट का ८० प्रतिशत इस्तेमाल सोशियल मीडिया और मनोरंजन के लिए उपयोग करते हैं. फेसबुक, व्हॉट्सएप, यूट्यूब यह हमारे मुख्य एपस हैं. इन् एपस पर हम अपनी निजी ज़िन्दगी के कुछ पल अपने दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों के साथ शेयर करते है. इसी बीच हम कई सारी खबरों से भी रूबरू होते हैं. और इंटरनेट के होते हुए अशिक्षित लोग भी यूट्यूब पर वीडियो के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.

मतलब अब हमारी आवाम के लिए जानकारी पाने को बेहद कम अवरोध रह गए हैं या शायद न के बराबर. कहाँ एक ज़माना था जब हमे कोई इतिहास से जुडी हुई जानकारी के लिए किताबे खरीदनी पड़ती थी. या फिर अखबार होते थे. उफ़ कितने मुश्किल के दिन थे वह भी. आज हमे कोई भी प्रश्न हो तोह हम तुरंत गूगल की मदद से उस पर ढेड़ सारी सुचना का भण्डार खुरेद सकते हैं. और जो इंटरनेट कहता हैं हम उसी हिसाब से सब मान लेते हैं. जैसे की हमने मान लिया ऊपर मैंने जो कहा की इंटरनेट भारत में १९९३ से आया जो श्रीनिवासन वेंकटकृष्णन ने लाया लेकिन वह गलत था. अगर आप जानते थे यह गलत हैं तोह आप जानकार इंसान हैं. लेकिन अगर आप नहीं जानते तोह आप यह बात शायद मान लेते और अपने किसी मित्र या परिवारजन से भी शेयर करते. और भले कुछ लोगो तक ही लेकिन गलत अफवाह ज़रूर फैलती. 

अब बेशक हर एक जानकारी को परखना बेहद मुश्किल हैं. हम कुछ भी पढ़ते या सुनते वक़्त अपना सारा ध्यान उसे समझने में लगा देते हैं. हम उनकी बताई गयी जानकारी का या आंकड़ों की जांच नहीं करते. यह बेहद निराशाजनक बात हैं लेकिन सच से ऊपर कुछ नहीं. तो में ज़्यादा नहीं कहूंगा लेकिन किसी भी फेसबुक पेज की बातें या यूट्यूब पर सुनी हुई कहानी/खबर को परखे उसके बाद ही किसीसे शेयर करे. क्यूंकि एक गलत खबर १०० सही खबरों के आड़े आ सकती हैं. 

और हाँ इंटरनेट कब आया और कौन लाया यह आप खुद कम्मेंट बॉक्स में बताये. और एक और जानकारी मैंने गलत दी है उसे भी बताये.

On National Sports day lets focus on the team behind the making of an athlete

India celebrates the National Sports Day today to mark the birthday of legendary hockey player Dhyan Chand. He was a master with a hockey stick and hope the women’s team pay him the tribute today by defeating China to enter the finals in Asian Games. But lets for today shift our attention from the players to the person who builds an athlete for a while.

We need to change our view on looking at sports as just a sport

What we see on television is the end result of a strong and collective effort of support staff members to guide an athlete in making the correct decisions. Universally admired masterpiece Taj Mahal was built by Shah Jahan but those thousands of workers who worked for 20 years to take care of every minute details are never given the credit. That is what happens with us. We do not admire the people we don’t get to see often.

In the latest monsoon session of Parliament Lok Sabha passed a bill to establish a National Sports University in Manipur (first in India). This is certainly a step forward but along with that, we need to look at sports in a positive way.

In the ongoing 18th Asian Games held in Indonesia, India has won 50 medals till the 10th day. While China is way ahead with 206 medals in total. Yes, their economy is way better than us but I am not here to moot over that topic. India has some of the best quality athletes but whenever you see a Chinese athlete you could feel the discipline they possess. China’s sports establishment is conceived as a tool for nation building. They have some severe training right from the age of six which is harsh and advocating for forcing kids to become athletes is not the right suggestion. But instead of just arguing to ban their products, we must learn good things from them.

Games are played on and off the field. A player winning a medal has an equal effort of every single person who looks behind them. They might not be good enough to win medals but can help crafting an athlete to do wonders. Their persistence, efforts requires to be known which is beyond the sports.

How is an athlete made

A 23-year-old Tajinderpal Singh Toor won a gold medal in shot put for India. He hurled the iron ball at a record-breaking distance of 20.75m. His coach MS Dhillon was not satisfied with his first four throws which were below 20m mark even though Singh had ensured a gold. From the sidelines, Dhillon shouted “You die of shame,” to make him furious and go beyond his limit. Singh’s father is fighting cancer and Singh was reluctant to come to Jakarta. But Dhillon persuaded him with the kind of experience Singh had. Coach knows perfectly what does an athlete needs during the time when it matters the most.

Athletics - 2018 Asian Games
Tajinderpal Singh Toor

The base of any athlete can be made strong right from his school. An athlete is not born but made. We need to have good Physical Education (PE) teachers who can guide kids to make healthy choices and they have to be their role model. A PE teacher may not be a successful athlete himself but disciplined towards staying fit.

They need to be good observers. Recognising which student needs more encouragement is a must trait. In the era where kids prefer playing games on gadgets, PE teachers need to be creative. Finding inspiration from YouTube videos, television and other stuff makes kids engaging with the game.

Profession behind the scenes

Technology has benefited players to improve their skills by tracking their performances. Every minute details about a player can be measured. For every athlete, there is the network of support staff which includes coaches, nutritionist, scientist and medical professions. Also the statisticians, mathematicians, analyser are essentials to push athletes beyond their limits. This collective desire of coach and staff for an athlete to win multiplies the athlete’s will.

Schools and colleges need to understand this and bring such courses where parents feel that it is a serious profession. Maybe in the upcoming years, India can get more athletes from every corner of the country. Also giving them the respect and financial aid is equally important.

Let’s make ourselves disciplined today for the better tomorrow.