इम्मिग्रेशन के मामले में हमारा दोगलापन!

इम्मिग्रेशन (आप्रवासन) मतलब जब कोई अपना देश या मूल निवास स्थान छोड़कर कहीं और जाके स्थायी रूप से बसे। अब इसे समझने वाले दो तरह के लोग होते हैं। एक होते हैं जो अपने देश या अपने राज्य को सिर्फ़ अपना मानते है और एक होते हैं जो पूरी दुनिया को एक मानते हैं। 

लेकिन कोई भला क्यूँ अपना देश या अपनी जन्मभूमि छोड़कर किसी और प्रदेश में जाके बसना चाहेगा? इसका एक ही सरल जवाब हैं “बेहतर अवसर के लिए/ बेहतर भविष्य के लिए”। चाहे यह अमरीका के इमिग्रंट्स से पूछो या गुजरात में आने वाले किसी उत्तर प्रदेश के व्यक्ति से सबका जवाब इसी बात के आसपास मिलेगा। 

कई बरसो पहले लोगों के जीवन में पैसों से व्यापार कम और वस्तुओं की अदल बदल से ज़्यादा रहता था। लेकिन धीरे धीरे एक राज्य से दूसरे राज्य के व्यापार होने लगे और देखते ही देखते यह व्यापार देश विदेश के बीच एक बेहद आवश्यक प्रकरण बन गया। अब जिसके पास कृषि उत्पाद कम था वह पैसे देकर अपने राज्य की माँग पूरी करने लगे। और आज यह व्यापार हम अपनी रोज़मरा की ज़िंदगी में करते हैं। और व्यापार के लिए पैसे आवश्यक हो गए।

लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ युवा वर्ग के लिए पैसे कमाने के अवसर कम हैं। अब वह अवसर की खोज में अच्छे राज्य या देश की ओर जाते हैं और बस जाते हैं। वह जिस राज्य या देश में जाके बसते हैं वहाँ के लोग उन्हें अस्वीकार करते हैं और तभी समस्या खड़ी होती हैं।

अब यह मुद्दा राष्ट्रवाद बनाम अंतर्राष्ट्रीयवाद हैं। अगर आप इन लोगों का विरोध करे तो आपको राष्ट्रवादी या स्वार्थी कहा जाएगा और अगर आप उन्हें दोनो हाथ फेलाकर स्वीकार करे तो ग्लोबलिस्ट कहे जाएँगे। नैतिक रूप से शायद आप यह कहेंगे की हमें हर इंसान को अपना समझकर स्वीकार करना चाहिए लेकिन जब तक उनकी ख़ुदके लाभ के बीच ना आए तब तक ही यह बात अच्छी लगेगी। लेकिन कोई अपना हक़ का बँटवारा शायद ही करना चाहेगा। 

इन लोगों को कई नेता अपनी राजनीति के लिए आतंकवादी या फिर जंग छेड़ने वाले लोगों की शक्ल में पेश करते हैं। अब यह कितना सच और कितना जुठ है यह आप लोग ही तय करे। आप नेशनलिस्ट हैं या ग्लोबलिस्ट यह ज़रा सोचे और बताए। सच बोलिएगा लिबरल विचारों का सम्मान करता हूँ लेकिन सचाई को नमन करता हूँ। क्यूँकि में ख़ुद भी बेहतर अवसर के लिए अपने राज्य से बाहर निकला था और तभी आज कुछ बन सका हूँ। लेकिन में शायद ही किसी और को अपनी जगह देना चाहूँगा। लेकिन क्या यह विचार मुझे सनातन धर्म के मूल संस्कार ‘वसुधेव क़ुतुम्बकम’ के विरुद्ध नहीं ले जाते?

इसका निष्पक्ष उत्तर शायद यहीं हो सकता हैं की अगर हम हमारे आसपास जितने अवसर मोजुद हैं उनसे ही संतुष्ट रहे और पैसों से व्यापार कम कर दे। शायद यह असंभव सुनाई पड़ता हैं ना? तो आप ही बताइए कोई उपाए…

या फिर कहिए आप भी इस मामले में हैं दोगले।

Published by

Jaideep Lalchandani

Jaideep Lalchandani has studied Journalism from Mumbai University. He loves to read and research about work that matters for the masses and not only the classes. Empowering U is a platform where he brings his creative freedom to write and criticise the status quo with precise information. He also shares his views on the current affairs on any random topics. He feels India needs to share the correct information amidst the growing threat of misinformation being spread.

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